“कला एवं वास्तुकला”

कला संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा है, और कला के बिना संस्कृति का ज्ञान अपूर्ण है क्योंकि कला भी सभ्यता के साथ-साथ विकसित हुई है। बल्कि अधिकांश पुरावेत्ताओं ने कला की वस्तुओं को देखकर इतिहास की शुरुआत बताई है। जब बात हिमाचल प्रदेश की है, तो प्रकृति ने इसे बहुत सुंदर ढंग से बनाया है. कांगड़ा, बिलासपुर सिमौर की समतल घाटियों से लेकर किन्नौर और लाहौल-स्पिति के गगनचुम्बी शिखरों, जिनके मध्य लंबी-लंबी नदियां बहती हैं, तक। यहां मानव के हाथों से कला के विभिन्न पहलुओं का उच्च विकास हुआ है, जैसे प्रदेश की प्राकृतिक बनावट कलात्मक है।

इतिहास ने इस विकास को प्रभावित किया है। यहां की प्रारंभिक कला को “खश-कला” कहा जाता है। फिर आर्य संस्कृति ने उस पर प्रभाव डाला। तिब्बत का पड़ोसी होने के कारण तिब्बत की क्षेत्रीय कला ने भी स्थानीय कलाकृतियों पर अपना प्रभाव छोड़ा है। यहाँ कला का निम्नलिखित हिस्सा बताया गया है। ़

चित्रकला

चित्रकला जीवन का अंग है। रक्त और शरीर के बिना जीवन संभव नहीं है। चित्रकला से कोई सामाजिक या धार्मिक उत्सव पूरा नहीं होता। घरों की सजावट में भी इसका प्रयोग होता है, साथ ही दैनिक कार्य में भी। गोलू-चूना दीवारों पर लगाने के बाद रंगीन चित्र बनाए जाते हैं। स्त्रियां घर के फर्श को गोबर से लीपते समय कई चित्र बनाती हैं। किसी भी उत्सव के दौरान, पुरोहित लोग आटे से मूर्तियां बनाते हैं और इसमें मूर्तियां डालते हैं। विवाह के दिन नाईन दीवार पर रंगीन चित्र बनाती है। इसके अलावा, धार्मिक उत्सवों और पर्वों के दौरान दीवारों पर या मिट्टी पर मूर्तियां बनाकर रंग से चित्र बनाए जाते हैं। यह सब आम लोगों की कला-प्रियता का संकेत है। यही नहीं, राजाओं ने चित्रकला के क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्वपूर्ण काम किया है, जो क्षेत्रीय विकास के अनुसार गुलेर, कांगड़ा, बसौहली, मण्डी, कुल्लू, बिलासपुर, चम्बा और अन्य शैलियों से जाना जाता है। 17वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान, विभिन्न शासकों की छत्रछाया में रियासतों में लगभग 38 कला केन्द्रों का निर्माण हुआ।

कांगड़ा शैली

गलेर की कलम ने कांगड़ा की शैली को जन्म दिया, जो इन सभी कलमों या शैलियों में विश्व प्रसिद्ध है। 18वीं शताब्दी में राजाओं की छत्रछाया में गुलेर में कला के विकास में ‘नानक’ और ‘नैनसुख’ नामक कलाकारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1780 के आसपास, कांगड़ा के राजा संसारचन्द, एक अच्छे चित्रकार और चित्रकला और कलाकारों का प्रशंसक और समर्थक था, ने चित्रकला को बढ़ावा दिया। उसने गुलेर कलम उठाया। इस शैली का मुख्य विषय-वस्तु प्रेम है, जिसमें कई चित्रों का नाम “रंगमाला” है। इन्हें जयदेव के “गीति-गोबिन्द”, बिहारी की “सतसई”, केशवदास की “रसिकप्रिया”, भगवद पुराण और महाभारत से प्रेरणा मिली है। इन चित्रों में नारी को उसके सबसे सुंदर रूप में चित्रित किया गया है। जिसकी लम्बी चोटी, गोल स्तन, पतली कमर, कटोरे जैसी आंखें और कोमल हाथ मेहंदी से सजे हैं। उसकी आंखों से उसकी कामुक भावना झलकती है। कहीं भी शालीनता की अवहेलना नहीं हुई है। अधिकांश चित्रों में राधा-कृष्ण दिखाई देते हैं। इसमें राजाओं और रानियों के चित्रों के अलावा अकेली रानियों या अन्य स्त्रियों के चित्र भी हैं। इन चित्रों में भावों की गहनता, विषयों की गम्भीरता, पुरुषों की विहलता और पात्रों की तल्लीनता देख सकते हैं।

बसोहली शैली

गुलेर या कांगड़ा शैली शायद बसोहली से भी प्राचीन हों। यह मण्डी, चम्बा और कुल्लू शैलियों पर प्रभाव डाला है। वैसे, हर पहाड़ी चित्रकला शैली कांगड़ा शैली से प्रभावित हुई है। विषय-वस्तु कांगड़ा की भांति होने पर भी, बसौहली कलम में मनोवेग को अधिक प्रबल रूप में व्यक्त किया गया है। इन चित्रों में आंखें बहुत बड़ी हैं। साथ ही, आकृतियां सभ्य नहीं हैं। इस शैली के चित्रों में प्रेमियों का कोमल नहीं बल्कि उत्तेजक रूप दिखाया जाता है। इस शैली को वहां के राजा ने प्रशंसा की। इन चित्रों में कुटीर उद्योगों में बनाया गया कागज प्रयोग किया गया था। है सियालकोटी कागज।

प्रमुख रूप से प्रयोग में लाए गए लाल, पीला, नीला और काला मुख रंग हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि 200 से 300 साल बीतने पर भी इन रंगों की चमक कम नहीं हुई है। कांगड़ा और हिमाचल प्रदेश के निम्न हिस्से के मंदिरों की दीवारों पर चित्रित चित्रों से भी पहाड़ी चित्रकला का प्रसार हुआ है। जो अभी भी देखने योग्य है। स्पिति में, चित्रकला का यह रूप ‘की ‘तांबो’ और अन्य बौद्धमतों की दीवारों पर भी देखा जा सकता है, भले ही उनकी शैली और विषय-वस्तु तिब्बत से भी प्रभावित हैं। वास्तुशिल्प: यहाँ मंदिर, राजाओं के महल, दुर्ग आदि हिमाचल प्रदेश की वास्तुकला का नमूना हैं। हिमाचल प्रदेश के मंदिरों को वास्तु-कला की दृष्टि से छतों के आकार के आधार पर विभिन्न शैलियों में बांटा जा सकता है, जैसे शिखर, समतल छत, गुंबदाकार, बंद छत और पैगोडा। हिमाचल प्रदेश में बौद्ध और जैन धर्मों के लकड़ी के कुछ अन्य मंदिर भी हैं।

  1. शिखर की शैली: इस शैली के मंदिरों में छत से ऊपर काफी ऊंचा पर्वत चोटीनुमा हिस्सा होता है। इस शैली के मंदिरों को धर्मशाला के निकट ‘मसरूर’ में चटानों से बनाया गया है। प्रदेश में कई मंदिर भी इसी शैली के हैं, जैसे ‘नार सिंह’।
  2. समतल शैली: इस शैली के मंदिरों में टीहरा सुजानपुर का नर्वदेश्वर मंदिर और नूरपुर का ब्रजस्वामी मंदिर शामिल हैं। 18वीं या 19वीं शताब्दी में बनाए गए राम और कृष्ण के मंदिर इस शैली के प्रमुख उदाहरण हैं। इनकी समतल छत और दीवारों पर कांगड़ा शैली के चित्रों की विशेषता है। स्पिति के ताबो, ‘कानम’ और ‘की’ जैसे बौद्ध मठों की दीवारों पर चित्रकारी भी इसी शैली की है।
  3. गुम्बदाकार डिजाइन: मुगल और सिक्ख शैली भी इन मंदिरों पर प्रभाव डाली है। इनकी दीवारें गुम्बदाकार होने के कारण कुछ झुकी हुई हैं। इस तरह के मंदिरों में कांगड़ा की ब्रजेश्वरी देवी और ज्वालाजी, ऊना की चिन्तपूर्णी और बिलासपुर की नैना देवी शामिल हैं। सिरमौर में माँ रेणुका मंदिर भी इसी शैली का है।
  4. व्यंजनों: जुब्बल के हाटकोटी में शिव मंदिर और हाटेश्वरी भी इसी शैली में बनाए जा सकते हैं। इस शैली के मंदिरों में से अधिकांश जुब्बल क्षेत्र में हैं।
  5. बंद छत की शैली: ये मंदिर बहुत प्राचीन हैं। इनमें से कुछ भरमौर में लक्षणादेवी मंदिर और छतराड़ी में शक्तिदेवी मंदिर हैं।
  6. पैगोडा डिजाइन: कुल्लू में इस शैली के मंदिरों में हिडम्बा देवी (मनाली), त्रिपुरा नारायण (दयार), आदि-ब्रह्मा (खोखण), मण्डी का पराशरदेव मंदिर और किन्नौर में सुंगरा का माहेश्वर और चगाओं मंदिर शामिल हैं।
  7. मिश्रित शैलियों के मंदिरों में पैगोडा और बंद छत: ऊपरी सतलुज घाटी में अक्सर इस शैली के मंदिर मिलते हैं। इनमें बाहरी सिराज में निरथ के ‘बाइन-महादेव’ और धनेश्वरी देवी के मंदिरों के नाम हैं।

चम्बा (भरमौर) के राजा मेरूवर्मन (550 ई.) और उसके कलाकार ‘गूगा’ का नाम मंदिरों के निर्माण में अमर रहेगा क्योंकि उन्होंने भव्य मंदिरों का निर्माण किया, जो हमारी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर हैं।

उपरोक्त के अलावा हिमाचल प्रदेश में अन्य प्रसिद्ध मंदिर हैं: चम्बा में मणिमहेश चम्बा के तीन विष्णु और तीन शिव के मंदिर, लाहौल में त्रिलोकीनाथ, बजौरा (कुल्लू) में विश्वेश्वर महादेव, नग्गर में गौरीशंकर और निरथ (शिमला) में सूर्यमंदिर, जिनमें पत्थर से बनाई गई कला है। यह प्राचीन नगर शैली का मंदिर है। बैजनाथ में वैद्यनाथ, मण्डी शहर में त्रिलोकीनाथ, पंचवक्त्र और अर्धनारीश्वरी के मंदिर मण्डप शैली में बनाए गए हैं। करसोग में ममेल मंदिर भी लोकप्रिय हैं।

जब बात महलों की आती है, तो प्रत्येक पहाड़ी राजा ने अपनी क्षमता के अनुसार महलों और दीवारों पर चित्रों का निर्माण करवाया। इनमें से कई आज भी जीवित हैं। इनमें टीहरा सुजानपुरा के राजा संसार चन्द के महल शामिल हैं, जो प्रसिद्ध वास्तुकला का एक उदाहरण है। साथ ही, कांगड़ा के किले, शाहपुरा के किले, त्रिलोकपुर के किले, नूरपुर के किले, कुल्लू में मदनकोट के किले, करसोग (मण्डी) में च्वासी का किला, सरकाघाट (मण्डी) में कमलाह का किला, नालागढ़ में रामशहर और मलौण के किले, बिलासपुर में ट्यून सरयून और बसेह के किले भी आज खण्डहरों की तरह दिखाई देते हैं यह विचार करने योग्य है कि इतनी बड़ी दुर्गम पहाड़ियों पर सामान पहुंचाकर किस प्रकार उनका निर्माण किया गया होगा। इन्हें इतना मजबूत समान लगाया गया है कि प्रकृति के प्रकोपों को सहने के बावजूद सैकड़ों वर्षों के बाद भी बिना किसी मरम्मत के खड़े रहे हैं।

सबंधित पोस्ट “रिति रिवाज व संस्कार”

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