“प्रजा मण्डल”

“प्रजा मण्डल”

अन्य रियासतों में भी जन संस्थाएं हैं. इन्हीं संस्थाओं ने आगे चलकर प्रजा मण्डल बन गए. देश के कांग्रेस नेताओं ने प्रजामण्डल आंदोलन का पूरा समर्थन किया, जिसका उद्देश्य था राज्यों में जनता की प्रतिनिधि सरकारें बनाकर विदेशी शासन को खत्म करना.

आल इंडिया स्टेट पीपल्स कान्फ्रेंस

आल इण्डिया स्टेट पीपल्स कान्फ्रेंस का अधिवेशन 1938 में लुधियाना में हुआ था, जिसमें पहाड़ी क्षेत्रों की रियासतों में प्रजा मण्डल बनाने और जनजागरण पर विशेष ध्यान देने का फैसला किया गया था. श्री एस. एस. धवन को पहाड़ी रियासतों का सर्वेक्षण करना मिला.

शिमला हिल स्टेट्स हिमालय रियासती जनसभा

लुधियाना कान्फ्रेंस ने पहाड़ी रियासतों में प्रजामण्डल आंदोलन को बल दिया, जिससे विभिन्न रियासतों के प्रजामण्डल बनाए गए और लुधियाना कांफ्रेंस के तुरंत बाद शिमला हिल स्टेट्स हिमालय रियासती प्रजामण्डल बनाया गया. राजा जन-आंदोलन को नियंत्रित करने से घबरा गए. प्रजा-मण्डल आंदोलन को कुचलने के लिए उन्होंने कई हथकंडे अपनाए. कई नेताओं की संपत्ति जब्त कर ली गई थी और उन्हें यातना दी गई थी.

धामी गोली कांड

प्रजा मण्डल आंदोलन तेज होता गया जैसे-जैसे राजाओं का दमन चक्र बढ़ा.13 जुलाई 1939 ई. को शिमला में शिमला हिल स्टेट्स हिमालय रियासती प्रजा मण्डल के नेता भागमल सौठा की अध्यक्षता में धामी रियासत (धामी-प्रेम-प्रचारिणः सधा) के 500/600 स्वयंसेवकों की एक बैठक हुई. इसमें एक प्रस्ताव पारित किया गया था कि धामी के राजा को जनता के प्रतिनिधि की तरह सरकार में शामिल करें, आधा कर माफ करें, दमनचक्र को समाप्त करें और राणा को प्रस्ताव की एक प्रतिलिपि भेजी गई, साथ ही सूचना दी गई कि 16 जुलाई को जनता के जत्थे धामी आकर सत्याग्रह करेंगे अगर उत्तर नहीं मिला. राणा ने संदेश वाहक को कैद कर दिया और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. 16 जुलाई, 1939 ई. को भागमल सौठा के नेतृत्व में एक जन प्रतिनिधि मण्डल धामी के लिए रवाना हुआ, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला. रास्ते में रियासत की सीमा पर घणाहटी के पास राणा की पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन वे नहीं रुके तो गिरफ्तार कर लिया गया और धामी (राजधानी-हलोग) ले जाया गया. रास्ते में लोग गिरफ्तार नेताओं के साथ मिल गए. हलोग से दो मील दूर एक पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, कुछ लोग पहले से ही एकत्रित हो गए थे. नारे लगाते हुए जनसमूह राणा के महलों की ओर चला गया. राणा घबरा गया और गोली चलाने की आज्ञा दी, जिससे दो लोग मारे गए और कई घायल हो गए.

जवाहर लाल नेहरू ने महात्मा गांधी की आज्ञा पर पंजाब के वकील दुनी चन्द को पहाड़ों में हुई इस अभूतपूर्व घटना की जांच के लिए नियुक्त किया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को दुनी चन्द कमेटी की रिपोर्ट मिलने पर राष्ट्रीय नेताओं का ध्यान पहाड़ों में जनता पर किये जा रहे अत्याचारों पर गया. इस घटना के बाद जन-आन्दोलन बढ़ गया. लोकतंत्र की भावना लोगों में फैलने लगी.

सिरमौर रियासत में राजा ने शासन किया. 1937 में, पहाड़ों के नेताओं का राजनैतिक गुरु चौधरी शेरजंग ने सिरमौर प्रजा मण्डल की बागडोर संभाली. उन्होंने अहमदगढ़ जेल से छुट्टी ली. इनके सहयोगी शिवनन्द रमोल, डा. यशवन्त सिंह परमार और उनके भाई थे। 1 इन नेताओं और उनकी संपत्ति को राजा राजेन्द्र प्रकाश ने रियासत से बाहर निकाल दिया.

पझौता अभियान

1942 में अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो का आह्वान किया गया था. इसी साल सिरमौर रियासत में एक बड़ा जन आंदोलन हुआ, जिसे पझौता- आंदोलन कहा गया. नाहन में प्रजा मण्डल के नेताओं ने राजा से मुलाकात की और कर्मचारियों की तानाशाही और घूसखोरी की शिकायत की. राजा ने स्वयं आने के बजाय लोगों को कुचलने के लिए सेना भेज दी. टोपीदार बन्दूकों और पत्थरों से लैस होकर लोगों ने पहाड़ों की चोटियों पर दो महीने तक सेना का सामना किया. आंदोलन के नेताओं में वैद्य सूरत सिंह, मियां चूचू बस्ती राम पहाड़ी और चेतराम वर्मा शामिल थे। जनता सेना के सामने कब तक लड़ सकती थी? 69 आदमियों को सेना ने गिरफ्तार कर लिया, जिनमें से 50 को आजीवन कारावास की सजा दी गई. लेकिन चेत सिंह वर्मा, बस्ती राम पहाड़ी और वैद्य सूरत सिंह को मार्च 1948 में रिहा किया गया.

हिमालयन हिल स्टेट्स क्षेत्रीय कौंसिल

अब तक, काशमीर से गढ़वाल तक के पहाड़ी क्षेत्र में प्रजा मण्डल की गतिविधियां फैली हुई थीं. हिमालयन हिल स्टेट्स रीजनल कौंसिल का गठन सभी पहाड़ी राज्यों को एक ही प्रशासनिक निकाय से जोड़ने के लिए हुआ था. शिमला इसका मुख्यालय था.

मंडल सम्मेलन

48 प्रतिनिधियों ने 8 मार्च 1946 से 10 मार्च 1946 तक मण्डी में जनप्रतिनिधियों की एक बैठक में भाग लिया. आजाद हिन्द फौज के पूर्व सेनानी कर्नल जी. एस. ढिल्लों ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। इनमें से एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव था कि सभी पहाड़ी रियासतों के प्रतिनिधियों की एक निर्वाचित संस्था बनाई जाए, जिसे राज्यों में मंत्री और कर्मचारी नियुक्त करने का अधिकार होगा. इससे हिमाचल प्रदेश बन गया. अब तक, पहाड़ी राजाओं ने नेताओं के खिलाफ दमन चक्र जारी रखा है. अधिकांश राजाओं ने दोहरी नीति लागू की. केन्द्रीय नेताओं को ये आश्वासन देते रहे कि हमारे राज्यों में कोई अशांति नहीं है, और राज्यों में नेताओं और जनता पर निरंतर दबाव डालते रहे.

15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया, लेकिन पहाड़ों की जनता को सामंतशाही की समाप्ति और जनप्रतिनिधि सरकार की स्थापना करनी पड़ी थी।

“अस्थाई हिमाचल सरकार का गठन”

 

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