“त्यौहार व मेले-1”

“त्यौहार व मेले-1”

वास्तव में, मेले और त्यौहार किसी भी क्षेत्र में सांस्कृतिक जीवन का अच्छा चित्रण करते हैं. हमारे त्यौहार हमें एकता के सूत्र में बांधते हैं और विभिन्न देवी-देवताओं से जुड़ी गाथाओं के साथ हमारे जीवन का तारतम्य जोड़ते हैं. हमारे मेले, चाहे वे त्यौहारों से जुड़े हों या नहीं, हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं और हमारे आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन से सीधे जुड़े हैं. हिमाचल प्रदेश में मनाए जाने वाले त्यौहारों का ऋतुओं से सीधा संबंध है. प्रत्येक नई ऋतु आने पर कुछ उत्सव मनाए जाते हैं. इसके साथ कुछ त्यौहारों का आगमन भी जुड़ा हुआ है. 7वीं और 15वीं शताब्दी के मध्य मैदानों से आने वाले लोगों के संपर्क या वहां से आने वाले राजाओं के राज्य स्तर पर मनाए जाने से हम दीवाली, दशहरा और होली जैसे त्यौहारों से परिचित हैं. कुछ त्यौहार बहुत प्राचीन हैं और शिव या शक्ति की पूजा से सीधे जुड़े हुए हैं. आजकल पशु मेले या व्यापाक अलग हैं.

देसी विक्रमी संवत् के महीनों के अनुसार त्यौहारों की तिथियां गिनती जाती हैं. यही कारण है कि प्रत्येक महीने का पहला दिन संक्रान्ति कहकर पुकारा जाता है और बहुत से लोग इस दिन व्रत रखते हैं. इस दिन कुल-पुरोहित का अधिकार होता है कि वह अपने यजमानों के घर जाकर दक्षिणा और अनाज ले. अनाज को निम्न भाग में नसरावां कहा जाता है. यजमान भी इस दिन पुरोहित को धन-अन्न देना शुभ मानते हैं. ठीक उसी तरह, पूर्णमासी का दिन, जब चन्द्रमा पूरी तरह से आकाश में दिखाई देता है, शुभ माना जाता है और लोग इस दिन उपवास करना पुण्य मानते हैं. अमावस्या भी शुभ दिन है. मां-बाप हर छुट्टी पर अपनी विवाहित लड़कियों को घर बुला लेते हैं. हमारे प्रमुख त्यौहारों में से कुछ प्रदेश भर में मनाए जाते हैं:

चैत की संक्रांति: विक्रमी संवत चैत मास की प्रथम तिथि, या देसी महीनों की तिथि, प्रारम्भ होता है. चैत की संक्रांति को त्यौहार भी मनाया जाता है ताकि नया वर्ष खुशहाल और शुभ हो. इस दिन पूजा की जाती है, लेकिन कोई खास भोजन नहीं बनाया जाता.

सारे चैत महीने में देसी मंगलमुखी या सुनाई या सनहाई और मध्य तथा ऊपरी भाग के ढाकी या तुरी जाति के लोग घर-घर जाकर शहनाई और ढोलकी बजाते हुए मंगल गान करते हैं। उन्हें लोग अनाज, रुपये, कपड़े आदि देते हैं.

ढोल कुल्लू में इस त्योहार को चतराली या चारा कहते हैं, जबकि चम्बा के भरमौर क्षेत्र में इसे ‘खेल’ कहते हैं. चराली में और रात को एकत्र होकर गाती है. 

चैत के महीने में निम्न भाग के क्षेत्रों में छिंज (कुशती प्रतियोगिता) होता है, जिसमें कुछ लोग अपनी इच्छा पूरी करते हैं या कुछ लोग सामूहिक तौर पर स्थानीय देवता, जिसे “लखदाता” कहते हैं, को प्रसन्न करने के लिए छिंज करते हैं, जिसमें दूर-दूर से पहलवान बुलाए जाते हैं. यह आमतौर पर एक समतल स्थान पर बनाया जाता है लेकिन आसपास से ऊंचा होता है ताकि लोग ऊंचे स्थान से कुश्तियों को देख सकें. जहां कुश्ती लड़ी जाती है, उस स्थान को खोदकर नर्म कर दिया जाता है. इसे ‘पिड़’ कहा जाता है.

दो या तीन आदमी पिड़ के चारों ओर चलते-चलते ढोलक बजाते रहते हैं, और कुश्ती ढोल की तान पर चलती रहती है. ये ढोल बजाने वाले मुसलमान लोगों को “परयाई” कहते हैं. जीतने वाले और हारने वाले पहलवानों को पैसे मिलते हैं. हारने वाले पहलवान को माली मिलती है. माली का मतलब चैम्पियनशिप है. छिंजों में भी कुछ पारम्परिक रूप से मनाए जाते हैं, लेकिन कुछ मन्नत पूरी होने के उपरांत एक परिवार द्वारा आयोजित किए जाते हैं.

बैशाखी का त्यौहार लगभग पूरे देश में पहली वैशाख, 13 अप्रैल को मनाया जाता है, जिसे बिस्सु या बिस्सा (शिमला), बीस (किन्नौर), बओसा (बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा) और लिसू (पांगी) कहा जाता है. रबी की फसल के आने से इस

त्यौहार का संबंध लगता है. इस दिन तीर्थ स्थानों पर स्नान करना पुण्यकर्म माना जाता है, चाहे वैसे भी हो. इस दिन बिलासपुर में मारकण्ड, मण्डी में रिवाल्सर और पराशर झीलों, तत्तापानी, शिमला व सिरमौर में गिरीगंगा, रेणुका झील आदि, कांगड़ा में बाणगंगा तथा अन्य जलतीर्थों पर स्नान किया जाता है। नए कपड़े पहनने और मीठे पकवान बनाने. इस दिन इन स्थानों पर मेले भी लगते हैं. तीर्थस्थलों से बाहर भी गांवों में मेले होते हैं। इस दिन लोगों को प्याऊ और मीठा शर्बत पिलाया जाता है. कई लोग यज्ञ भी करते हैं.

नोहले: प्रदेश के निचले भाग में ज्येष्ठ मास की संक्रान्ति (13-14 मई) को नाहौले नामक त्यौहार मनाया जाता है, जिसमें मीठे खाना बनाकर खिलाया जाता है. यह चम्बा के गद्दी से अलग है.

हरियाली तृतीय (कांगड़ा, सिरमौर), हरवाली (शिमला), (जुब्बल-किन्नौर), शेगत्सुम (लहौल), चिड़न (बिलासपुर-मण्डी) आदि श्रावण मास की संक्रान्ति, 13–14 जुलाई को मनाया जाता है, जो वर्षा से जुड़ा हुआ है. इस दिन पशु जूं चचड़ (पिस्सू) और पिथड़ निकालकर गोरक में डालकर चौराहे पर जाते हैं, जहां लोग मीठे पकवान बनाते हैं. लोग मानते हैं कि ऐसा करने से बरसात में पशुओं को इन कीड़ों से बचाया जा सकता है. संस्कृति में इस उत्सव को “शेगत्सुम” कहा जाता है. यही दिन लोग पाल फू, धूप और सत्तू का गोला (ऊपर मक्खन) जला कर घर की छतों पर ले जाते हैं और उन्हें हवा में फेंककर “गैफा” गुरू को भेंट चढ़ाते हैं.हरियाली तृतीय (कांगड़ा, सिरमौर), हरवाली (शिमला), (जुब्बल-किन्नौर), शेगत्सुम (लहौल), चिड़न (बिलासपुर-मण्डी) आदि : यह त्यौहार श्रावण मास की संक्रान्ति (13-14 जुलाई) को मनाया जाता है जिसका सम्बंधआने वाली वर्षा ऋतु से होता है। जहां इस दिन लोग मीठे पकवान बनाते हैं, पशुओं जूं चचड़ (पिस्सू) और पिथड़ आदि निकालकर गोरक में डाल कर चौराहे पर जाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से बरसात में पशुओं को इन कीड़ों से राहत मि है ऐसा लोगों का विश्वास है। लहौल में इस त्यौहार को ‘शेगत्सुम’ कहते हैं इस दि सवेरे ही लोग “टोहु” (सत्तु का गोला बनाकर ऊपर मक्खन रखे हुए) और पाल फू तथा धूप जला कर घर की छतों पर ले जाते हैं और उन्हें हवा में फेंककर “गैफा” गुरू को भेंट चढ़ाते हैं।

रक्षा-बंधन, रखड़ी या रख, डुन्या (बिलासपुर आदि), रक्षपुन्या (शिमला) और सलूनु (मण्डी- सिरमौर): भादों मास में पड़ने वाली पूर्णमासी को यह त्यौहार मनाया जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों को टीका लगाकर राखी बांधती हैं और पैसे या कपड़े देती हैं. इस दिन पुरोहित भी घर-घर जाकर राखी बांधते हैं, जो रक्षा का प्रतीक है.

चेरवाल: यह मध्य और ऊपरी क्षेत्रों का त्यौहार है, जो भादों को संक्रान्ति (15–16 अगस्त) से शुरू होकर पूरे महीने मनाया जाता है.(गोलाकार मिट्टी की तह को जमीन से निकालकर एक लकड़ी के तख्ते पर रखा जाता है. एक छोटी तरह की दूसरी तह निकालकर पहली पर रखी जाती है, और उसके चारों ओर हरी घास और फूल लगाए जाते हैं. इसे चिड़िया कहते हैं. इसे घर के बाहर बरामदे में रखा जाता है. घर के सभी लोग शाम को धूप जला कर और फल आदि देकर पूजा करते हैं. विशेष खाना बनाया जाता है. बच्चे चिड़िया का गाना गाते हैं. ये भादों के अंतिम दिन पूजे जाते हैं. और सितंबर के पहले आसूज में इसे गोबर के ढेर पर फेंक दिया जाता है. जहां से उसे खेतों में ले जाया गया. यह पृथ्वी-पूजा भी कहलाता है. कुल्लू में इस उत्सव को “भदरांजो” और चम्बा में “पथेडु” कहा जाता है, जिसमें लड़कियां नाचती हैं और एक खाना बनाया जाता है जिसे पथोड़ कहा जाता है.

जगराता या जागरा: साल के किसी भी दिन किसी भी देवता की याद में जगराता मनाया जा सकता है, लेकिन भादों महीने में इसका खास महत्व है. किसी देवी-देवता के मन्दिर में य. देवता को घर में बुलाकर जगराता का आयोजन किया जा सकता है. रखने वाले परिवार के सदस्यों और आसपास के लोगों ने सारी रात जागकर संबंधित देवताओं का कीतर्न-गान किया. मध्य भाग में महासु देवता जागरा का नाम है. अन्य देवताओं के नाम भी जागरे हैं. मंदिर में देवता को नहलाया जाता है और एक छोटी मूर्ति को छोड़कर सभी मूर्तियां पर्दे में रखी जाती हैं.मंदिर के सामने सारी रात आग जलती रहती है और देवता की प्रशंसा करते हुए गाने गाए जाते हैं. सामूहिक रूप से नृत्य करते हुए महासु देवता की स्तुति में “विड्स” गान गाया जाता है. ननिहाल अक्सर घर के बड़े बेटे के लिए मन्नत के रूप में जागरा ले जाते हैं.

भारथ: निम्न भाग में भादों के महीने और वर्ष के बाकी महीनों में भारथों का आयोजन किया जाता है. भरथ को भी जगराते की तरह गाया जाता है. वास्तव में, भारथ में इस तरह का गायन करने वालों की एक कुशल टोली होती है, जिसमें प्रत्येक सदस्य अपने अलग-अलग वाद्य यन्त्रों, जिनमें डमरू और थाली शामिल हैं, के वादन के साथ गाता है. शेष लोग उन्हें सुनकर खुश होते हैं. भारथ गायन एक वीर देवता की गाथा से प्रेरित है. हिमाचल प्रदेश में भारथों द्वारा गाई जाने वाली गूगा-गाथा प्रमुख है.

 

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